राष्ट्र के सविंधान को धर्म निरपेक्ष नहीं होना चाहिए, राष्ट्र के सविंधान को धर्म विमुक्त होना चाहिए।
हम सब अपने आप में एक पूरा संसार होते है।
एक इंसान के तोर पर अगर कहूं तो मेरा संसार केवल मेरे आस पास का जहाँ ही होता है। हममे से ज्यादतर तो अपने पास के 50 से 100 किलोमीटर से ज्यादा के बाहर का संसार कभी देख ही नहीं पाते।
हम अपने धर्म से जुड़े या राजनीती से जुड़े फैसले केवल सुनी हुए या किसी भी तरीके से हम तक पहुंची है। हमे किसी प्रमाण की जरूरत ही महसूस नहीं होती। और न ही हम कभी इस बात पर विचार करते है कि इसका हमारी जिंदगी पर क्या असर होगा। क्या सही है या क्या गलत ? एक बार हम कोई धारणा बना लेते है तो केवल उसका ही अनुसरण करते है। बिना यह सोचे की यह गलत है या सही।
अगर हम भारत की राजनति की बात करते है तो देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा आजादी के बाद से केवल एक राजनैतिक दल को ही वोट डालता था। उसका कारण कुछ भी हो सकता है। पर उसका सबसे मुख्य कारण है - एक धारणा बना लेना की देश पर राज करने का हक़ केवल इनको ही है।
उसके बाद छोटे छोटे बदलाव हुए पर वो धारणा को ज्यादा परवर्तित नहीं कर पाए। लोग परिवर्तन चाहते पर कही न कही फिर भी मन में बसी धारणा उन्हें वो करने से रोकती। फिर हमने लोगो की मानसिकता को एक ही बार में बदलते देखा। लेकिन मानसिकता को धारणा बनने में समय लगता है।
दुनिया के जयादातर धर्म भी केवल धारणा के भरोसे ही जीवित है। उनके सारे ग्रंथो में जो लिखा है वो वास्तविकता से कोशो दूर है। आप उन सब चीज़ो को आज के ज्ञान से प्रमाणित नहीं कर सकते। आज से सालो पहले आप बिना सम्भोग के एक मसीहा के जन्म की कल्पना नहीं कर सकते। आप किसी व्यक्ति की कोरी कल्पनाओ और किस्सों को एक ऐसी शक्ति के बोल नहीं कह सकते जिसको आज तक किसी ने नहीं देखा हो। और कुछ ग्रंथो को केवल इसीलिए मान्यता नहीं दे सकते क्यूँकि कोई कहे की ये पीढ़ी दर पीढ़ी केवल सुनाएँ जा रहे थे और अब इनको लिखा गया है।
जब हम बच्चे होते है तो हमारी कोई धारणा नहीं होती। हमे नहीं पता होता की हमे क्या बोलना है , कौन सी भाषा बोलनी है। सब कुछ हमे सिखाया जाता है। हमारे मानसिकता को बचपन में ही परवर्तित कर दिया जाता है। परिवार चाहता है कि हमारी राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक मानसिकताये सम्मान हो। और हम एक मानसिकता को धारण करते है।
राजनैतिक और समाजिक धारणाये तो परवर्तित होती रहती है क्यूंकि वहां हमे और भी विकल्प मिलते है पर धार्मिक धारणाओं पर खतरे का डर दिखाया जाता है तो उसके परिवर्तन के विकल्प नहीं होते। अगर कुछ विकल्प है भी तो वो पहले से विद्यमान धारणाओं से भी ख़राब है।
उदाहरण के तौर पर दुनिया के सबसे बड़े धर्मो में से एक धर्म इस धारणा पर टिका हुआ है कि उनका मसीहा अप्राकृतिक तरीके से धरती पर आया। फिर उनको उसके जीवन के बहुत साल का पता नहीं उसने कहाँ गुजारे। फिर अचानक से कहानी में हीरो आ जाता है।
फिर एक दूसरे धर्म ने इस धर्म की कहानी चोरी की। अपना दूत उसमे जोड़ा और अपना ग्रन्थ लिख दिया।और कहा की पहले वाला धर्म गलत है। सबसे बड़ी बात इन दोनों ही धर्मो ने जिस धर्म के ग्रन्थ से जायदातर हिस्सा लिया उसको ही खत्म करने का हुक्म इनके आकाओ ने दे दिया।
धर्म और राजनीती हमेशा से एक दूसरे से जुडी रही है।
धर्म, राजनीती को पोषित करता है और राजनीती धर्म की रक्षा का वचन देता है। राजनीती और धर्म को एक दूसरे से अलग करना असम्भव है। इसीलिए राष्ट्र के सविंधान को धर्म निरपेक्ष नहीं होना चाहिए, राष्ट्र के सविंधान को धर्म विमुक्त होना चाहिए।
धर्म विमुक्त होने का मतलब है - उसके अनुसार कोई भी धर्म विद्यमान ही नहीं है। उसका केवल एक ही धर्म है और वो है राष्ट्र धर्म।
उसके किसी भी कार्य में, किसी भी प्रणाली में धर्म अड़चन नहीं होना चाहिए। धर्म निरपेक्षता कभी न कभी केवल एक धर्म की तरफ झुकाव पैदा कर सकती है क्योकि वह सभी धर्मो को उनकी मान्यताये मानने की आजादी देती है पर धर्म विमुक्ता ऐसा नहीं करेगी क्युकी किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपनी धारणाओं और मान्यताओं से विमुक्त होकर रहना पड़ेगा। वो अपनी धार्मिक मान्यताओं के बारे में न तो प्रदर्शन कर सकेगा और न ही बात।
जब सार्वजानिक तौर पर धार्मिक विचारो पर पाबंदी होगी तो किसी भी धार्मिक स्थल की जरूरत ही नहीं रहेगी तो उनको नष्ट कर देना ही समाज के हित में होगा।
धर्म निरपेक्षता एक ढोंग है। केवल अपनी राजनैतिक और धार्मिक धारणाओं की पूर्ति करने का , अपना स्वार्थ पूरा करने का। धर्म विमुक्तता सही मायने में एक अच्छे राष्ट्र के निर्माण में सहायक हो सकती है।